| ای غبارت گذشته از پروین! |
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چند باشی غبار روی زمین؟ |
| آفتابی! به رفعِ ظلمت کوش |
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آسمانی! به زیرِ پا منشین |
| نقدِ عشقی! مرو به بیعِ هوس |
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نورِ هوشی! بساطِ وهم مچین |
| پایبندِ طلسمِ خاک مباش |
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که نَفَس نیست آنقدَر سنگین |
| دشتِ امکان ز پرتواَت ایمن |
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باغِ دهر از گُلِ تو خُلدِ برین |
| چشمِ عشق از تجلیات روشن |
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کامِ حسن از تبسّمت شکرین |
| تابعِ عشرتِ تو شام و سحر |
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مدّتِ جلوهات شهور و سنین |
| روز و شب آسمانِ عالیقدر |
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به هوای تو در طوافِ زمین |
| پرتوِ آفتابِ عالمتاب |
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سوده در پایِ سایهی تو جبین |
| زندگی با توجّهات توأم |
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نیستی از تغافلت گلچین |
| شرحِ افکارِ تو نقوشِ کمال |
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متنِ اِقرارِ تو علومِ یقین |
| لطفِ تو مایهی بهارِ کَرَم |
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خُلقت آیینهی حقیقتِ دین! |
| بهرِ تحقیقِ مُصحَفِ قَدرَت |
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هم وجودِ تو آیتیست مُبین |
| هرچه دارد زمانه از کج و راست |
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هست از بازیات رخ و فرزین |
| حاصلِ مدعایِ راز، تویی |
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ای دعاهایِ خَلق را آمین |
| حرفی از درسِ عشق میگویم |
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نتوان یافت معنیئی به از این |
| تک و پو داشت کاف و نون که هنوز |
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نگرفته تَرَنگِ او تسکین |
| چون شدی محرم این حقیقت را |
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پس چه ما و چه من چه آن و چه این |
| بیسخن هرچه هست مکشوف است |
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نَکِشد هوش، منّتِ تلقین |
| گوش اگر ساز کردهای بشنو |
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چشم اگر باز گشته است ببین |